शिव महिमा वर्णन

न शब्दों में तुम समाते हो, न मौन तुम्हें बाँध पाता है,
हे महाकाल! समय स्वयं तुम्हारे चरणों में शीश झुकाता है।

न तुम केवल कैलाशवासी, न तुम केवल श्मशान के स्वामी,
कण-कण में तुम्हारा विस्तार, तुम ही आद्य, तुम ही अनामी।

जब सृष्टि ने प्रथम श्वास लिया, वह तुम्हारा ही स्पंदन था,
जब अंतिम दीप बुझ जाएगा, तब भी शेष तुम्हारा वंदन था।

गंगा की धारा में तुम हो, अग्नि की ज्वाला में तुम हो,
वायु के हर सूक्ष्म कण में, जीवन की माला में तुम हो।

नीलकंठ! विष को पीकर भी अमृत का मार्ग दिखाते हो,
दुख की घोर अँधेरी रातों में आशा का सूर्य उगाते हो।

डमरू की ध्वनि से जन्मे वेद, तांडव से जग का ज्ञान हुआ,
तुमसे ही गति, तुमसे ही शक्ति, तुमसे ही यह ब्रह्म विधान हुआ।

न धन माँगूँ, न वैभव माँगूँ, न यश का कोई हार मिले,
बस इतना वर दो शंभो, मन में तुम्हारा प्यार मिले।

जब तक प्राण रहें तन में, शिव-नाम हृदय में गूँजता रहे,
अंतिम क्षण में भी "हर हर महादेव" अधरों पर पूजता रहे।

ॐ नमः शिवाय।
हर हर महादेव। 🙏🔱
प्रगति मिश्रा

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