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पसंद बहुत हो तुम मुझे

गति प्रबल निज चलने को

खामोश अभी भी तुम हो

हां मैं लेखक और तुम मेरी रचना हो

कुछ रिश्ते छूट ही जाए

ना जाने कितनी तलक