गति प्रबल निज चलने को
गति प्रबल भरी मुझमें।निज चलने को
कर नहीं सकता मैं प्रयास खुद रूकने को,
चाहे जितना प्रयास किए जाए रोकने,
ली है संकल्प लक्ष्य से पहले नहीं रूकने की "
हो मार्ग चाहे कितना जीर्ण ,
जब तक लक्ष्य न मिले ,
तब तक मुझमें आस नहीं विराम की,
कुछ कह लिया कुछ सुन लिया,
आगे निरन्तर बढ़ने की,
एक नई उम्मीद गढ़ने को,
निज गति लिए प्रगति के पथ पर,
अपूर्ण जीवन को पूर्ण करने को,
कुछ पाता कुछ खोता हुए
आशा और निराशा से घिरा रहता,
गति प्रबल भरी मुझमें निज चलने को ,
निज जीवन मे एक नया इतिहास रचने को,
विवादों से भरा जीवन किसको नहीं जीना पड़ा ,
दुख सुख किसको जीवन मे नही सहना पड़ा ।।
फिर मैं जीवन रथ कैसे रोक लू,
किया प्रण निज आगे बढ़ने का जब,
क्योंकि मेरी सफ़लता अभिराम है,
गति प्रबल भरी प्रगति में निज चलना ही काम है,

Comments
Post a Comment