महिमा प्रयागराज की

 तीर्थराज की महिमा
तीनों नदियों का पावन संगम,
जहाँ आस्था का दीप जले,
गंगा-यमुना की निर्मल धारा,
हर मन के अंधकार हरे।
अक्षयवट की छाया में बैठा,
इतिहास स्वयं कहानी कहता,
ऋषियों की तपभूमि यह पावन,
भारत का गौरव बढ़ता रहता।
कुंभ का मेला जब सजता है,
जन-जन का विश्वास उमड़ता,
साधु-संतों के पावन चरणों से,
धरती का कण-कण निखरता।
आज़ाद की वीरता की गाथा,
यहाँ की हवाओं में बसती,
स्वाधीनता के अमर स्वप्न की,
ज्योति निरंतर यहाँ बरसती।
हे प्रयागराज! तुझको नमन,
तू संस्कृति का अमर प्रकाश,
तेरी महिमा गाता रहे,
भारत का हर जन, हर श्वास।
—प्रगति मिश्रा

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