रात्रि की चादर

रात्रि की चादर जब धीरे-धीरे धरती पर फैल जाती है,
दिनभर की चहल-पहल भी अपनी थकन समेटकर सो जाती है।

नील गगन के विस्तृत आँगन में चाँद दीप-सा जलता है,
टिमटिम करते असंख्य सितारों का सुंदर मेला लगता है।

शीतल पवन के मधुर झोंके मन को सहलाने आते हैं,
दिनभर की सारी चिंताओं को पलभर में दूर भगाते हैं।

वृक्षों की शाखाएँ मंद-मंद संगीत सुनाती रहती हैं,
निशा की नीरवता में जैसे कोई कथा कहती रहती हैं।

रात्रि केवल अंधकार नहीं, यह चिंतन का उपवन है,
जहाँ आत्मा स्वयं से मिलती, मन पाता नव जीवन है।

दिन के कोलाहल में जो बातें अनसुनी रह जाती हैं,
वे रात की गहराई में अक्सर आवाज़ बन जाती हैं।

किसी विरही के नयनों में यह यादों का सागर भरती है,
किसी कवि के कोरे कागज़ पर नव कल्पनाएँ धरती है।

किसी साधक को ध्यान मार्ग का यह अमूल्य उपहार लगे,
किसी पथिक को दूर क्षितिज तक फैला शांत विस्तार लगे।

चाँद की चाँदी-सी किरणें जब धरती पर बिखर जाती हैं,
तालाबों के निर्मल जल में सुंदर छवियाँ बन जाती हैं।

जुगनुओं की छोटी-सी लौ भी दीपक जैसी लगती है,
रात की गोद में हर छोटी चीज़ अनमोल सी लगती है।

रात्रि हमें यह शिक्षा देती, धैर्य कभी मत खोना तुम,
घोर अँधेरा कितना भी हो, आशा का दीप संजोना तुम।

हर काली रात के पीछे स्वर्णिम प्रभात खड़ा होता है,
संघर्षों से लड़ने वाला ही जीवन में बड़ा होता है।

इसलिए मुझे प्रिय है रात्रि, यह शांति का संदेश सुनाती है,
मन के सूने कोनों में नव विश्वास का दीप जलाती है।

अंधकार का रूप लिए भी उजियारे का मार्ग दिखाती है,
रात्रि अपनी मौन वाणी से जीवन का सार सिखाती है।
✍️ 
लेखक – प्रगति मिश्रा

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