यह जीवन तेरे बिना
यह जीवन तेरे बिना हर श्वास अधूरी लगती है,
मन की हर धड़कन जैसे कोई दूरी कहती है।
वे गलियाँ, वे पथ, वह पीपल की शीतल छाया,
हर स्मृति आज भी आँखों में आकर रहती है।
मिट्टी की वह सोंधी गंध, वर्षा की पहली बूँदें,
मन की सूनी चौखट पर चुपके से बहती है।
न जाने कैसा बंधन है तेरी सरल दृष्टि का,
हर छवि आती-जाती है, तू ही ठहरती है।
कितने रूप मिले जीवन के इस लंबे पथ पर,
पर मन की वीणा केवल तेरा ही स्वर कहती है।
चाहा था समय के संग सब कुछ पीछे छूटेगा,
पर तेरी स्मृति हर संध्या दीपक-सी जलती है।
जब-जब मन थककर अपने भीतर लौट आता है,
तेरी मधुर हँसी बनकर आशा फिर खिलती है।
तेरे संग देखे थे जो स्वप्न सुनहरे कल के,
उनकी हर आहट अब भी मन में गूँजती रहती है।
यदि मिलना भाग्य-लिखित होता तो क्या कहना था,
अब तो केवल यादों की नौका ही बहती है।
फिर भी कोई राग नहीं, कोई शिकायत भी नहीं,
सच्चा प्रेम सदा मन में निर्मल होकर रहता है।
जो अपना होता है, वह दूरी से भी अपना है,
प्रेम कभी अधिकार नहीं, केवल अर्पण रहता है।
प्रगति

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