अनुरक्त जीवन की विरक्त् कहानी
अनुरक्त जीवन की विरक्त कहानी,
सरिता-सी बहती क्षणभंगुर जवानी।
अधरों पर मुस्कान का उजला आभास,
अंतर्मन में फिर भी गहन नीरवता की रवानी।
जीवन के प्रचंड झंझावातों में
विचारों का अनवरत द्वंद्व चलता है,
कभी आशा का दीप प्रज्वलित होता,
कभी संशय का तम मन को छलता है।
निर्झर की कल-कल ध्वनि-सा
हर क्षण समय सरक जाता है,
एक प्रभात नव स्वप्न सजाता,
एक संध्या सब कुछ सिखलाता है।
स्मृतियों का अथाह सागर
मन के तट को बार-बार भिगोता है,
बीते हुए प्रत्येक स्पंदन का
मौन इतिहास स्वयं संजोता है।
अपने ही स्वप्नों की मृत्तिका से
मन प्रतिदिन अपना भविष्य गढ़ता है,
टूटे विश्वासों की राख तले भी
आशा का अंकुर चुपचाप बढ़ता है।
प्रातः की शीतल, मंद समीर
थके हुए प्राणों को सहलाती है,
सांझ की रक्तिम अरुणिमा
जीवन का गूढ़ सत्य बतलाती है।
कभी तपते मरुस्थल-सा संघर्ष,
कभी वर्षा की शीतल फुहार;
कभी हिमशिखर-सा अटल धैर्य,
कभी सागर-सा अथाह विस्तार।
हार और विजय के मध्य कहीं
मन अपना वास्तविक स्वर खोजता है,
वेदना की अग्नि में तपकर ही
मानव कुंदन बनकर निखरता है।
जो बीत गया, वह काल की धूल हुआ,
जो आने वाला है, वह अभी अनलिखा है;
जो इस क्षण हृदय में धड़क रहा,
वही जीवन का सच्चा लेखा है।
अनुराग यदि मर्यादा का दीप बने,
विराग यदि करुणा का आलोक बने,
तो मानव जीवन केवल जीवन नहीं,
धरती पर उतरता दिव्य लोक बने।
चलते रहना ही साधना है,
संघर्ष ही जीवन का उत्सव है;
जो स्वयं को पहचान सके,
वही सच्चे अर्थों में मानव है।
जीवन नदी है—बहना उसका धर्म,
प्रेम उसकी धारा, धैर्य उसका मर्म।
जो स्वयं को जग के हित अर्पित कर दे,
वही अमर होता है, वही होता है कर्म।
लेखक प्रगति

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