वो खिड़की अब भी खुलती है

वो खिड़की अब भी खुलती है

वो खिड़की अब भी खुलती है, मगर तुम अब नज़र नहीं आती,
सुबह तो रोज़ उतरती है, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

उसी गली से गुज़रता हूँ, उसी राह पर ठहरता हूँ,
जहाँ कभी तुम मिलती थीं, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

हवा में आज भी घुली हुई है तेरी बातों की ख़ुशबू,
फ़िज़ाएँ तेरा नाम कहती हैं, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

मैं जब भी उस तरफ़ देखूँ, दिल की धड़कन बढ़ जाती है,
नज़र खिड़की पे ठहरती है, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

वो फूल, वो बाग़, वो मौसम, सब कुछ वैसा ही लगता है,
रंगों में तेरी छवि बसती है, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

कितनी ही शामें बीत गईं तेरे इंतज़ार की लौ लेकर,
चिराग़ आज भी जलता है, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

मेरी आँखों में यादों का एक अथाह समंदर ठहरा है,
लहरें तुझ तक जाती हैं, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

कभी ख़्वाबों में आ जाती हो चाँदनी बनकर चुपके से,
नींदों में तो मिल जाती हो, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

मैंने समय की धूल हटाकर हर याद को फिर से पढ़ा है,
हर पन्ने पर तुम मिलती हो, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

न जाने कौन-सी दूरी है, न जाने कैसी मजबूरी है,
मेरे दिल में आज भी तेरा घर है, मगर तुम अब नज़र नहीं आती।

कभी जो एक झलक भर से मेरी दुनिया महका देती थी,
वही दुनिया आज भी मेरी है, मगर तुम अब नज़र नहीं आती॥

— प्रगति मिश्रा


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