प्रकृती का श्रिंगार
हां मुझे घूमना पसंद है,
बैठकर गोद में प्रकृती के
एकांत में खुद से बातें करना पसंद है
देखता हूं मैं जब कलकल बहती नदियों को,
सुनता हूं जब चिड़ियों के कलरव को,
मन मन मेरा प्रफुल्लित हो उठता है,
देखकर प्रकृत कि इस हंसी को पता है,
मन प्रसन्न चित्त हो उठता है,
निरंतर यह कलरव गान बना रहे हे,
यह धरती तेरा यह सिंगार बना रहे,
चाहे हो जिस मौसम की बात,
देती है हरियाली यह एहसास,
जीवन में हो चाहे जितनी उतार-चढ़ाव,
कभी ना हो उदास
आज जेठ की है दुपहरी तो कल होगी बरसात,
मत करो अपने मन को तुम कभी भी उदास,

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